IAS टॉपर रवि कुमार सिहाग की सफलता की कहानी

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IAS टॉपर रवि कुमार सिहाग की सफलता की कहानी: यूपीएससी एमएसई परीक्षा पास करने की जब बात आती है तो कैंडिडेट्स अक्सर कई तरह के सवाल उठाते हैं और कई विषयों को लेकर निष्पक्ष दिखते हैं। जैसे उनका बैकग्राउंड हंबल है, उनका एजुकेशनल रिकॉर्ड ठीक नहीं है, उनके अध्ययन का माध्यम हिंदी है। रवि ये सब और ऐसे बहुत से सवाल का जीता-जागता जवाब हैं। उन्होंने एक बहुत ही साधारण किसान परिवार से और हिंदी मीडियम का स्टूडेंट होने के बावजूद अपने पहले ही प्रयास में यूपीएससी सेंटरई परीक्षा पास की। रवि को देखकर साफ पता चलता है कि एक एवरेज स्टूडेंट जिसकी स्कूलिंग बहुत ही साधारण जगह से हुई हो या जिसके परिवार में कोई इस फील्ड में न रहा हो, वह भी अगर थान ले और कड़ी करे तो सफल हो सकता है। दिल्ली नॉलेज ट्रैक को दिए इंटरव्यू में रवि ने यूपीएससी परीक्षा से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर खुलकर चर्चा की।

कैसे आए यूपीएससी का ख्याल –

रवि बताते हैं कि वे अपने पिता के साथ बचपन से ही खेती-किसानी का काम देखते थे। बी तक उन्होंने खेती से जुड़े हर काम की जिम्मेदारी संभाली है। ऐसे में जब गांव में खेतों को लेकर, सिंचाई को लेकर या इससे संबंधित किसी भी क्षेत्र में समस्या आती थी तो कहा जाता था कलेक्ट्रेट ऑफिस जाना था। हर परेशानी का समाधान वहाँ होता था। तब से वे सोचते थे कि आखिर कलेक्टर ऐसा होता है जिसके पास हर छोटी-बड़ी समस्या का समाधान होता है। इसके अलावा गांव में अक्सर लोग कहते हैं कि तुम कौन सा कलेक्टर हो जो ये काम कर लोगे, ये परेशानी दूर कर दोगे वगैरह। ऐसी बातें सुनकर ही रवि का इस क्षेत्र के प्रति आकर्षण पैदा हुआ। केवल बै के बाद उन्होंने इस क्षेत्र में किस्मत आजाने का फैसला किया ताकि लोगों की समस्या का समाधान आसानी से हो सके।

दिल्ली नॉलेज ट्रैक को दिए इंटरव्यू में राव ने विस्तार से बात की –

एनसीईआरटी से किया गया तगड़ा –

रवि कहते हैं कि यूपीएससी का सिलेबस ठीक से देखने और समझने के बाद उन्होंने बेसिक बुक्स से शुरुआत की। अपने इस सफर में सबसे खास साथी वे एनसीईआरटी की किताबों को मानते हैं। रवि कहते हैं कि यूपीएससी परीक्षा एक पूरा पैकेज होता है जो प्री से लेकर पर्सेनेलिटी टेस्ट तक आपको हर प्रकार से टेस्ट करता है। पहले आप यह ठीक से समझ लें कि आखिरकार यह एग्जाम शायद चाहता है कि उसके बाद मैदान में उतर जाए।

बुक लिस्ट की जहां तक ​​बात है तो यह ज्यादातर स्टूडेंट्स के लिए सेम ही होता है सुलझाए इस बात का रखना है कि कम से कम किताबें इकट्ठी करें और उन्हें बार-बार पढ़ें। सीमित रिसोर्स, मैक्सिमम रिविजन पॉलिसी को फॉलो करें। ये मानकर चलें कि किताब में लिखा हुआ एक-एक शब्द आपको पता होना चाहिए ताकि इतनी बार रिवीजन हो जाए।

हिंदी माध्यम से नहीं हुई कोई बात –

राव कहते हैं कि कैंडिडेट्स अक्सर हिंदी माध्यम को लेकर कांफिडेंट फील नहीं करते हैं जबकि ऐसा नहीं है। आपका माध्यम क्या है इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है। उनका माध्यम तो हिंदी ही था साथ ही औप्शनल भी हिंदी लिटरेचर था। इसके बावजूद उन्होंने न केवल परीक्षा पास की बल्कि ऑप्शनल में बहुत अच्छे अंक भी पाए। नतीजा यह हुआ कि वे साल 2018 के हिंदी मीडियम के टॉपर बने।

वे दूसरे कैंडिडेट्स को भी यही सलाह देते हैं कि इन फालतू चीजों में समय न छोड़ावाएं कि आपका माध्यम क्या है या आप पहले पढ़ाई में अच्छे नहीं थे। इस एनर्जी को परीक्षा की तैयारी में खोजें तो बहुत लाभ मिलेगा। किसी भी अंग्रेजी में मीडियम कैंडिडेट को सफलता पाने के लिए जितने पापड़ बेलने पड़ते हैं उतने ही आप भी बेलेंगे। मध्यम कभी इसमें रुकावट नहीं बनती।

अंग्रेजी भी जरूरी है –

रवि आगे कहते हैं कि हिंदी मीडियम चुनना और उसे परीक्षा देना ठीक है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप अंग्रेजी में सीखेंगे नहीं। इस परीक्षा में सफलता हासिल करने और आगे काम-काज देखने के लिए अंग्रेजी में एक मुख्य जरूरत है। इसलिए इसे इग्नोर न करें और न ही यह सोचें कि आप हिंदी मीडियम के हैं तो अंग्रेजी सीखने की आपको कोई आवश्यकता नहीं है।

अंत में बस इतना ही कि इस परीक्षा को लेकर कैंडिडेट्स के दिमाग में कई प्रकार की भ्रांतियां है उनमें से एक है कि यह परीक्षा बहुत कठिन है और इसे आसानी से पास नहीं किया जा सकता है। राव कहते हैं कि सभी का अपना सोचना होता है पर उन्हें ऐसा लगता है कि यह परीक्षा पास करना बहुत कठिन नहीं है। सही अपरोच के साथ सही दिशा में बढ़ने और कड़ी मेहनत के साथ कोई भी इस परीक्षा को पास कर सकता है। राव कहते हैं कि अगर मैं कर सकता हूं तो कोई भी कर सकता है।

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